Thursday, December 13, 2012


“Please… अब तो बड़े हो जाइए

बचपन की एक बात बताता हूं... एक दिन पापा गुलाब जामुन लाए, हम बहुत खुश हुए...ये हमारी फेवरेट स्वीट डिश जो है। वैसे तो उन दिनों पृथ्वी पर हमारे आगमन को जुम्मा जुम्मा चार पॉच साल ही हुए थे..पर चूंकि हम घर में सबसे छोटेऔर दुलारे थे इसलिए थोड़ा सिर चढे हुए थे..या फिर थोड़े से शायद थोड़ा ज्यादा। हर बात में जिद्द, हर चीज को तुरन्त पा लेने की बेफिजूल चाहत...और घर में आने वाली हर चीज पर अपना सबसे बड़ा हिस्सा... जो अक्सर मिल ही जाता था.. और खुदा ना खास्ता अगर नहीं मिला तो चीखों का दौर, ऑसुओं का सैलाब और कोहराम..घर इन तीन चीजों का मिश्रण बन जाता था। इस उम्र के शायद सभी बच्चें ऐसे ही होते हैं.. हर चीज में बस मेरा मेरा का ही राग अलापते हैं.. मुझे ये चाहिेए..मुझे वो चाहिेए..और कई बार तो 'सिर्फ मुझे' ही चाहिए.. किसी और को मिले या ना मिले..भाड़ में जाए खैर गुलाब जामुन पर वापस आते हैं.. अपनी फेवरेट चीज देखकर हम एक बार फिर बौरा गए..कर बैठे जिद्द.."सिर्फ हम खाएंगे.. किसी को नहीं देगें"  हालांकि ये सभी जानते थे कि इतने सारे गुलाब जामुन अकेले हमारे बूते के नहीं.. इसलिए सब हमारी नौटंकी देखते रहे..सहते रहे.. पर बात गुलाब जामुन की थी..सो बड़े भइया से रहा ना गया..उनकी बेकरारी छलांग मार गयी और वो हम पर.. मेरे और उनके बीच गुलाब जामुन के लिए जद्दोजहद शुरू हो चुकी थी.. घर में शोर शुरू हो चुका था.. कभी उनकी जोर की डांट का तो कभी उनकी उस डांट से निकलने वाली मेरी इमोशनल चीखों का। गुलाब जामुन ठंडे हो रहे थे और माहौल गरम... इसी गरमा गरमी में बढ़कऊ ने finally हमारे तड़ा तड़ दो कंटाप जड़ दिए.. बस फिर क्या था गुलाब जामुन से बेवफा होकर हम जग सूना सूना टाइप लगे रोने...चीघांड़ मार मार के..
पापा को भाई की ये हरकत बहुत बुरी लगी उन्होनें भाई को मारा तो नहीं लेकिन डॉटां बहुत.. पापा ने कहा अभी वो बच्चा है, नादान है.. इतना मेच्योर नहीं हैं कि सबके बारे में सोच सकें...... बड़ा होगा तो समझ जाएगा.. उनको डांट पड़ी मै खुश हो गया..और मुझे डांट ना पड़े इस डर से शराफत से सबको खुद ही गुलाब जामुन जा जा कर दिए..भाई को तो अपने हॉथ से खिलाए..
इस घटना को 17-18 साल हो चुके हैं..पर पापा की वो बात अभी तक याद है.. अभी वो बच्चा है, नादान है.. इतना मेच्योर नहीं हैं कि सबके बारे में सोच सकें...... बड़ा होगा तो समझ जाएगा.. मै बड़ा तो हो गया..शायद enough मेच्योर भी पर... जिस बड़प्पन की बात पापा ने कही थी वो बड़प्पन किसी में दिखायी नहीं पड़ता। आज इस नौकरीपेशा जिंदगी में सभी को अपनी मस्ती में मस्त देखता हूं.. दीन-दुनिया तो दूर की, लोग अपने ही कोलीग से कोई खास मतलब रखना नहीं चाहते। सबके बारे में या फिर अपने ही साथी के हित के बारें में सोंचना मानो महापाप हो गया हो ..     अब लोगों का मानना है कि किसी और के बारे में नही सिर्फ अपने बारें में सोंचो। ये cut throat competition का जमाना है.. जहां दूसरो की भलाई एक गुनाह और किसी के लिए त्याग आपके immature होने का सबसे बड़ा सबूत। पापा की परिभाषा के हिसाब से अब मै बड़ा हो चुका हूं, मेच्योर हो चुका हूं..क्योंकि अब मै अपनी हर चीज आसानी से शेयर कर सकता हूं...अपनी इच्छाओं के साथ साथ दूसरों की भावनाओं का भी ख्याल करता हूं..और मुझे भी यही अच्छा लगता हैं...यही सही लगता है..emotional level पर भी और professional level पर भी। मुझे पापा की बातों पर कोई शक नहीं। इसलिए मै भी इसी बात पर जोर दूंगा कि इतना पढ़ लिखकर भी अगर कोई सिर्फ अपने बारे में सोच पाता है तो ये वाकई निराशाजनक हैं..साथ ही ये कई सवाल खड़े करता है आपकी संस्कृति पर, आपकी शिक्षा पर। मेरे एक मित्र का कहना हैं कि अपने लिए सबको आवाज़ उठानी पड़ेगी..सही है..बेशक आवाज़ उठाएं लेकिन दूसरों की आवाजं भी सुने।   
दिल तो बच्चा है जी का तमगा सुनने में तो कमाल लगता हैं पर यकीन माने ये तमगा सिर्फ इश्क की गलियों तक ही फरमाया जाए तो बेहतर... क्योंकि इश्क की गली के बाहर जिंदगी के कई चौराहों पर सच्चे और अच्छे लोगों का साथ बहुत जरूरी है और ये तभी संभव है जब हम सब सिर्फ अपने बारे में नहीं , सबके बारे में भी ना सही पर कम से कम अपनों के बारे में अपने साथीयों के बारे में सोचेंगें.... इसलिए अब प्लीज बड़े हो जाइए..वरना ये जिंदगी पापा नहीं बढ़कऊ की तरह है जो समझाती कम और मारती ज्यादा है।
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Friday, December 7, 2012

'sada adda' te 'sadi life'
काफी दिन से उदास था,हताश था, निराश था.. निराश इतना कि लिखना भी छूट सा गया था... क्या करूं जो करना चाहता हूं वो मिल नहीं रहा ,जिससे दूर भागता हूं वो मानो पुरानी प्रेमिका की तरह हर पल आलिंगन को तैयार है।
खैर.... आज छुट्टी है इसलिए कल घर आकर  दोस्त का लैपटॉप उठाया...पासवर्ड से अज्ञात था.. अंदाजा मारा जो सीधे तुर्रे पर लग गया, लैपटॉप खुल गया। इरादे कुछ और थे..पर सामने "साडा अड्डा" दिख गया। फिल्म की काफी तारीफ सुनी थी, सो डबल क्लिक कर दिया।
फिल्म शुरू होती है एक कोटेशन से...
"DEDICATED TO ALL THOSE WHO FOUGHT FOR THEIR DREAMS" लड़ाई तो हमने भी खूब लड़ी, लड़ रहें हैं... लगा कि फिल्म में अपनी भी लाइफ के दो चार सीन होगें।  लेकिन दो चार नहीं..यहां तो मानो फिल्म की आधी कहानी हमें ही DEDICATED थी..पहले ही सीन में अपना रूम दिखा और फिर तुरंत बाद सफल यादव और जोगी के रूप में अपने रूमी.. ये कहानी है इरफान,जोगी,कबीर,रजत,समीर और सफल यादव नाम के 6 दोस्तों की जो मैं और मेरे दोस्तों की तरह अलग-अलग हिस्सों से अपने सपनें सच करने दिल्ली आएं हैं।
हकीकत की तरह फिल्म में भी लाइफ कभी भागती तो कभी दौड़ती और इस दौड़ में ना जाने कितनी बार कितने मखौटे बदलती.. मखौटा कभी अच्छा दोस्त बनने का,कभी अच्छा इम्प्लॉयी बनने का,  कभी अच्छा ब्वायफ्रेंड तो कभी अच्छा बेटा और भाई बनने का।  मखौटे बदलना आसान है ..लेकिन जिंदगी आसान कहां है, ना सच में और ना इस फिल्म में। बारी बारी से सभी दोस्तों को जिंदगी जबरदस्त ठोकर मारती है... किसी का प्यार छूटता है.. तो किसी की नौकरी, किसी के सपने बिखरते है तो कोई उम्मीदों के बोझ तले इतना दब जाता हैं कि उसकी जीने की ख्वाहिशें भी सिसक कर दम तोड़ देती है.. आईएस ना बन पाने के कारण "सफल यादव" आत्महत्या कर लेते है । प्रोजेक्ट के रूप में इरफान की दिन रात की मेहनत को बॉस कूड़ेदान में डाल देता है, कबीर को बहन की और खुद की शादी के लिए एक अच्छी नौकरी चाहिए,रजत अपने उस पिता को याद करते हुए रोता जो उसे खर्चा तो देता है लेकिन एक साल तक उसकी शक्ल देखने से मना कर देता है, समीर के हांथ आयी हॉलीवुड फिल्म अब उसके हांथ में नहीं..हालाकि इन सब के बीच जोगी कुछ उम्मीद जरूर जगाता है..
बुरे हालातों में फँसे इन दोस्तों के साथ बहुत कुछ और भी बुरा होता.. एक समय ऐसा भी आता है कि लगता है कि बस.. अब सब कुछ यहीं खत्म..ये सबकुछ खत्म होने वाला एहसास, एक ना एक बार हम सभी को अपनी लाइफ में जरूर होता है.... और सच मानिए यहां से वाकई सब कुछ खत्म हो सकता है...सब कुछ बिखर सकता हैं और अपने इन बिखरे सपनों को आप समेटकर अपनी यांदों के पिटारे में बंद कर सकतें हैं ..जिस पर आप "पापा के अधूरे सपने" का तमगा लगाकर अपने बच्चों को गिफ्ट कर सकते हैं । लेकिन नहीं आपकी हर ending आपके नए सपनो की begining होनी चाहिए। जैसे इन सब दोस्तों की होती है....एक बार फिर सभी खड़े होते हैं ..आगे बढते हैं ..और हासिल करते हैं ..वो सब जो उन्होने सोचा था..वो सब जो इनकी जिंदगी थे..इनके सपने थे।
इस फिल्म को देखने के बाद मैं खुद में एक नयी energy महसूस कर रहा हूं।  एक बार फिर मैं अटल निश्चय के साथ खड़ा हूं।
जाते जाते भी ये फिल्म एक कुटेशन के साथ खत्म हैती है...
"THE ONLY THAT WILL STOP YOU FROM FULLFILLING YOUR DREAM IS YOU"   
और मै खुद अपने सपनों के लिए रूकावट नहीं बनना चाहता इसलिए अब ना मैं उदास हूं और ना निराश..हताश तो बिल्कुल नहीं..। मै शाहरूख ख़ान ना सही पर लड़ूंगा तो मैं भी.. जब तक हैं जान..जब तक हैं जान...। 

Wednesday, September 26, 2012

REVIEW OF HEROINE


"हीरोइन" मेरी नज़र से.....

'डर्टी पिक्चर' की 'फैशन'एबल "हीरोइन" 

एक हीरोइन की कहानी नहीं बल्कि किसी भी आम इन्सान की बेवकूफी और गलतियों की कहानी हैं फिल्म "हीरोइन" । फिल्म में करीना कपूर के रूप में माही अरोड़ा का किरदार किसी भी आम लड़की से कुछ ख़ास जुदा नहीं । किसा भी आम लड़की की तरह माही भी अपने प्यार को  लेकर बेहद पजे़सिव और इन्सिक्योर हैं। कहते हैं इन्सान बेवकूफी भी  अपने लेवल के हिसाब से करता हैं, क्योंकि माही एक बड़ी स्टार हैं, जाहिर हैं उसकी बेवकूफी और गलतियां भी बहुत बड़ी-बड़ी थी। वैसे तो मधुर अपने नए-ऩए प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं लेकिन हीरोइन में उन्होने अपनी ही पुरानी फिल्म 'फैशन' की लाइन अपनायी हैं, फिल्म की कहानी थोड़ी बहुत डर्टी पिक्चर की कहानी से भी मेल खाती हैं। डर्टी पिक्चर की रेश्मा फिल्म पाने के लिए कुछ भी कर सकती थी और हीरोइन की माही अपनी फिल्म को हिट कराने के लिए कुछ भी कर सकती हैं....'कुछ भी'। संगीत के नाम पर फिल्म का केवल एक ही गाना 'संइया' ही आपके कानों को सुकून पहुंचाएगा। ये सिर्फ करीना, अर्जुन रामपाल और रणदीप हुड्डा की कमाल की अदाकारी ही हैं जो फिल्म को एक बार देखने लायक बनाती हैं, बाकी कहानी बेहद बेकार हैं।  'तपन दा' के रूप में रणवीर शौरी का किरदार छोटा लेकिन बेहद अहम और जबरदस्त हैं।  फिल्म का अंत निराशाजनक हैं, 'THE END' के टैग के बाद भी आपको लगेगा कि ' पिक्चर अभी बाकी हैं ' । यूं तो आपको ऐसी कई फिल्में मिल जाएंगी जो आपको एक स्टार, एक हीरोइन बनने के लिए इन्सपायर करेंगी लेकिन फिल्म हीरोइन कहीं न कहीं ये संदेश देती हैं कि सबकुछ बनना लेकिन कभी 'हीरोइन' मत बनना ।